नमस्कार
किस्से सिनेमा के इस एपिसोड में मैं आपके लिए एक ऐसे गाने की कहानी लेकर आया हूँ…बात है मुंबई के टार्डियो में स्थित एक मशहूर स्टूडियो की…जहाँ लक्ष्मीकांत-प्यारेलाल और आनंद बक्शी एक गाने पर काम कर रहे थे।लेकिन… गाना बन ही नहीं पा रहा था…लक्ष्मीकांत जी को पान खाने का बहुत शौक था।उन्होंने कहा—“बक्शी साहब, चलिए बाहर पान खा आते हैं…”आनंद बक्शी बोले—“आप बैठिए, काम कीजिए… मैं पान लेकर आता हूँ…”स्टूडियो के बाहर एक पान की दुकान थी…जहाँ बहुत भीड़ थी… और शोर भी बहुत था…आनंद बक्शी ने पान लगाने को कहा…तभी पानवाला गुस्से में चिल्लाया—“अरे भाई, शोर मत करो… शोर मत करो…ये मेरे काम का समय है…!”बस… यहीं से आनंद बक्शी के दिमाग में एक मुखड़ा कौंध गया ⚡वो तुरंत पान लेकर वापस आए…और बोले—“एक शानदार मुखड़ा आया है… सुनाऊँ?”उन्होंने कहा—“सावन का महीना पवन करे शोर…”लक्ष्मीकांत जी ने तुरंत कहा—“शोर नहीं… शोर!”यहीं से गाने में वो मासूमियत आई…क्योंकि फिल्म का हीरो थोड़ा भोला-भाला था,जो “शोर” को “सोर” बोलता है ❤️आनंद बक्शी ने तुरंत पूरा मुखड़ा लिख डाला—“सावन का महीना, पवन करे शोर…जियरा रे झूमे ऐसे, जैसे बनमा नाचे मोर…”ये गाना फिल्म “मिलन” का था…जिसमें सुनील दत्त और नूतन ने काम किया था।जब ये गाना रिकॉर्ड हुआ…तो लता मंगेशकर जी ने आनंद बक्शी को दो बार बधाई दी 🙏उन्होंने कहा—“बक्शी साहब, आपने ऐसा गाना लिखा है…जो दोनों किरदारों को ज़िंदा कर देता है…”इस गाने ने इतिहास रच दिया…और इतना सुपरहिट हुआ कि आज भी…जब ये बजता है…तो लोग बस सुनते ही रह जाते हैं… 🎧तो ये थी कहानी…एक पान की दुकान से जन्मे उस गीत की…जो आज भी हर दिल में बसता है ❤️हम फिर मिलेंगे…एक और दिलचस्प कहानी के साथ…नमस्कार 🙏जिसे आप सालों से सुनते आ रहे हैं… और जो आज भी उतना ही सुपरहिट है
