मीना कुमारी – एक अधूरी दास्तान
31 मार्च 1972…
जब मीना कुमारी इस दुनिया को अलविदा कह गईं, उस वक्त नर्गिस मुंबई में नहीं थीं।वो अपने पति सुनील दत्त के साथ जम्मू-कश्मीर की यात्रा पर थीं।जैसे ही नर्गिस को मीना की मौत की खबर मिली, वो अंदर से टूट गईं…क्योंकि मीना कुमारी उन्हें “बाजी” कहकर बुलाती थीं।नर्गिस, मीना कुमारी और मधुबाला — तीनों के बीच बहनों जैसा रिश्ता था।जब मधुबाला का निधन हुआ था, तो नर्गिस ने खुद उनके पार्थिव शरीर को नहलाया था।लेकिन आज… जब मीना कुमारी चली गईं, नर्गिस उनके पास नहीं थीं।और यही बात उन्हें जिंदगी भर सालती रही…
एक बार मद्रास में फिल्म की शूटिंग के दौरान
नर्गिस अपने बच्चों संजय दत्त और नम्रता के साथ आई थीं।मीना कुमारी बच्चों के साथ ऐसे घुल-मिल गईं…जैसे वो उनकी अपनी माँ हों।उन्हें दूध पिलाना, सुलाना, लोरी गाना…सब कुछ उन्होंने खुद किया।ये देखकर नर्गिस भावुक हो गईं और पूछा—“मीना, क्या तुम्हें माँ बनने की इच्छा नहीं है?”मीना ने दर्द भरी आवाज़ में कहा—“बाजी… ऐसी कौन सी औरत होती है, जो माँ नहीं बनना चाहती?”इस एक वाक्य में उनकी पूरी जिंदगी का दर्द छुपा था…
अपमान, दर्द और टूटता रिश्ता
फिल्म पिंजरे के पंछी की शूटिंग के दौरानएक दिन सेट पर ऐसा हादसा हुआ जिसने सबको हिला दिया।कमाल अमरोही के मैनेजर बाकर नेसबके सामने मीना कुमारी को थप्पड़ मार दिया…पूरा सेट सन्न रह गया।मीना ने उसी दिन फैसला कर लिया—अब वो कभी कमाल अमरोही के घर वापस नहीं जाएंगी।और सच में… वो फिर कभी उस घर में नहीं लौटीं।
मोहब्बत… और फिर
इसी बीच मीना कुमारी की जिंदगी में आए धर्मेंद्र।नर्गिस कहती थीं—“मैंने मीना को इतना खुश पहले कभी नहीं देखा।”लेकिन ये खुशी ज्यादा दिन नहीं टिक सकी…कुछ गलतफहमियों ने इस रिश्ते को भी तोड़ दिया।इसके बाद मीना कुमारी अकेलेपन में डूबती चली गईं…और शराब उनकी जिंदगी का हिस्सा बन गई।लोग आए…उनका इस्तेमाल किया…और उन्हें और भी तोड़कर चले गए…
पाकीज़ा – एक आखिर
फिल्म पाकीज़ा की शूटिंग बीच में ही रुक गई थी।लेकिन नर्गिस ने मीना को समझाया—“एक प्रोफेशनल कलाकार बनो… और अपनी जिम्मेदारी पूरी करो।”मीना मान गईं…और बीमारी के बावजूद उन्होंने फिल्म पूरी की।3 फरवरी 1972 को पाकीज़ा का प्रीमियर हुआ।नर्गिस आईं… मीना को गले लगाया… बधाई दी लेकिन वो फिल्म पूरी नहीं देख सकीं…
मीना… तुम्हें तुम्हारी मौत मुबारक
मीना कुमारी ने अपनी बहन से कहा था—“बाजी के लौटने से पहले मैं इस दुनिया में नहीं रहूँगी…”और ऐसा ही हुआ…31 मार्च 1972 को वो दुनिया छोड़ गईं।जब नर्गिस वापस लौटीं…वो सीधे कब्रिस्तान पहुँचीं…घंटों रोती रहीं…और फिर कहा—“मीना… तुम्हें तुम्हारी मौत मुबारक…क्योंकि ये बेवफा दुनिया तुम्हारे लायक नहीं थी…”
अधूरी बात… अधूरी कहानी
मीना कुमारी नर्गिस से कुछ कहना चाहती थीं…लेकिन वो बात… उनके साथ ही दफन हो गई…नर्गिस जिंदगी भर यही सोचती रहीं—“आखिर वो क्या कहना चाहती थी?”मीना कुमारी ने दुनिया कोअपनी एक्टिंग, शायरी और मोहब्बत दी…लेकिन बदले में उन्हें मिला—दर्द, तन्हाई और बेवफाई…और यही उनकी कहानी को अमर बना देता है…
