धूप से भरी एक दोपहर थी। सड़क किनारे पड़े कूड़ेदान के पास एक छोटा लड़का कुछ ढूँढ़ रहा था। अचानक उसे कागज़ों के बीच एक पुरानी किताब मिल गई। वह खुशी-खुशी किताब उठाकर आगे बढ़ा ही था कि तभी सामने से आते हुए रोनी ने उसके हाथ से किताब झटके से ले ली।
“ये किताब तुम्हें कहाँ मिली?” रोनी ने उत्सुकता से पूछा। लड़का बोला, “कबाड़ के डिब्बे में पड़ी थी… सोचा रद्दी में बेच दूँगा।”रोनी ने किताब को पलटकर देखा। कवर पर मोटे अक्षरों में लिखा था—“उठा पटक” उसने धीरे-धीरे पन्ने पलटे। कुछ पंक्तियाँ पढ़ते ही उसके चेहरे पर हैरानी उभर आई।कहानी में एक महिला का ज़िक्र था—मधुबाला।
मोहल्ले में उसकी खूबसूरती की चर्चा दूर-दूर तक थी। उम्र चालीस के आसपास होने के बावजूद उसमें एक अलग ही आकर्षण था, जिसे देखकर लोग अक्सर ठहर जाते थे।रोनी ने किताब बंद कर दी।“अजीब कहानी है…” वह बुदबुदाया।
घर का माहौल
कुछ देर बाद रोनी घर पहुँचा। दरवाज़े की घंटी बजाते ही उसकी मामी कमला ने दरवाज़ा खोला।“कहाँ रह गया था इतने देर?” कमला ने हल्की झिड़की दी।रोनी मुस्कुराया, “मामी आज रविवार है… दोस्तों के साथ क्रिकेट खेल रहा था।”तभी पीछे से एक मधुर आवाज़ आई—“अच्छा है… आजकल बच्चे मैदान में खेलना भूल ही गए हैं।”रोनी ने मुड़कर देखा। सामने खड़ी थी एक खूबसूरत महिला—मधु।कमला ने परिचय कराया, “ये मेरी पुरानी दोस्त मधु है… और ये रोनी… मेरे साथ ही रहता है।”मधु ने मुस्कुराते हुए रोनी को गले लगा लिया।
वह तो उसे एक बच्चे की तरह ही देख रही थी, मगर रोनी को उस स्पर्श में एक अजीब-सी गर्माहट महसूस हुई।कुछ पल के लिए वह चुप रह गया।“मैं कमरे में जा रहा हूँ मामी,” कहकर रोनी अपने कमरे की ओर चला गया।
किताब का असर
कमरे में पहुँचकर रोनी आईने के सामने खड़ा हो गया। उसके दिमाग में अभी भी वही किताब घूम रही थी।वह बिस्तर पर बैठा और फिर से उठा पटक के पन्ने पलटने लगा।कहानी में लिखा था कि मधुबाला का व्यक्तित्व ऐसा था कि लोग उसकी ओर खिंचे चले आते थे। उसके पड़ोस में रहने वाला एक युवक राज भी उसकी ओर आकर्षित था।रोनी पढ़ते-पढ़ते कल्पनाओं में खो गया।उसे लगा जैसे वह खुद उस कहानी का हिस्सा बन गया हो।
एक अजीब निमंत्रण
तभी दरवाज़े पर दस्तक हुई। कमला अंदर आई।“रोनी, मधु तुम्हें अपने घर बुला रही है। उसके कंप्यूटर में कुछ दिक्कत है।”रोनी ने किताब बंद की और उठ खड़ा हुआ।“ठीक है मामी… अभी जाता हूँ।”उसके मन में हल्की-सी उत्सुकता थी।
मधु का घर
मधु का घर बेहद सुंदर था। अंदर जाते ही रोनी चारों तरफ नज़रें दौड़ाने लगा।“कैसा लगा मेरा घर?” पीछे से मधु की आवाज़ आई।रोनी थोड़ा झेंप गया।“बहुत अच्छा है।”मधु मुस्कुराई और उसे सोफे पर बैठने का इशारा किया।“दरअसल मेरे लैपटॉप में थोड़ा काम है… सोचा तुम देख लोगे।”रोनी कंप्यूटर खोलकर काम में लग गया।मधु उसके पास बैठी थी। कमरे में हल्की-सी खुशबू फैल रही थी। रोनी का ध्यान कभी स्क्रीन पर जाता, कभी अनजाने में मधु की ओर।कुछ देर बाद काम पूरा हो गया।“हो गया,” रोनी ने कहा।मधु ने संतोष से सिर हिलाया।“धन्यवाद… कभी-कभी पड़ोसी ही सबसे काम आते हैं।”
एक नया मोड़
शाम ढल रही थी। रोनी घर लौट आया, मगर उसके दिमाग में दिन भर की घटनाएँ घूम रही थीं।वह फिर वही किताब उठाकर पढ़ने लगा।कहानी जैसे-जैसे आगे बढ़ रही थी, रहस्य भी बढ़ता जा रहा था।क्या सचमुच मधुबाला जैसी महिला की ज़िंदगी में इतने राज़ छिपे थे?और क्या यह सिर्फ कहानी थी…
या हकीकत से मिलती-जुलती कोई सच्चाई?रोनी सोच में डूबा था।तभी बाहर से मामी की आवाज़ आई—“रोनी… अभी तक सोया नहीं?”वह चौंककर उठ बैठा और किताब जल्दी से छिपा दी।“बस मामी… अभी आता हूँ।”
एक नई शुरुआत
अगली सुबह जब रोनी घर से बाहर निकला तो अचानक उसकी टक्कर एक लड़की से हो गई।उसकी फाइल नीचे गिर गई… और उसी के साथ उठा पटक की किताब भी।लड़की जल्दी में थी। उसने बिना देखे सब कागज़ समेटे और आगे बढ़ गई।रोनी कुछ पल बाद समझ पाया—
किताब उसके पास रह गई थी।“अरे…!” वह घबरा गया।फिर मुस्कुराकर बोला—“चलो… अब शायद अगली कहानी किसी और की ज़िंदगी बदल दे।”और यहीं से एक नई कहानी शुरू होने वाली थी…
