“जब सपनों की रानी बनी टीचर”

बाज़ार की भीड़ के बीच अनिल खड़ा था। उसके हाथ में एक अजीब-सी किताब थी—“उठा-पटक”। वह पिछले एपिसोड की घटनाओं से जैसे अचानक वर्तमान में लौट आया।अनिल ने किताब खोली और पढ़ना शुरू किया। पहले ही पन्ने पर एक शीर्षक चमक रहा था

“जब सपनों की रानी बनी टीचर”

अनिल हल्का-सा मुस्कुराया और पढ़ने लगा।उसके कानों में जैसे किसी की आवाज़ गूँज उठी—“हर इंसान ने कभी न कभी प्यार ज़रूर किया है…और प्यार किसी से भी हो सकता है।यह कहानी भी ऐसे ही एक प्यार की है…एक ऐसी टीचर की, जिसकी खूबसूरती देखकर किसी भी छात्र का ध्यान पढ़ाई से भटक जाए।”अनिल ने अचानक किताब बंद कर दी।“ये कैसी बातें लिखी हैं लोगों ने… टीचर के बारे में ऐसा कौन सोचता है?”वह बुदबुदाया और वहाँ से चल पड़ा।

टीचर का घर

कुछ देर बाद अनिल अपनी टीचर दिव्या मैम के घर पहुँच गया। उसने डोर बेल दबाई, मगर बेल काम नहीं कर रही थी।दरवाज़ा थोड़ा खुला था।अनिल झिझकते हुए अंदर चला गया।हॉल में सन्नाटा था। वह सोफे पर बैठ गया और इधर-उधर देखने लगा।अचानक उसे अंदर के कमरे से कुछ हल्की-सी आहट सुनाई दी।जिज्ञासा में वह धीरे-धीरे उस दिशा में बढ़ा और खिड़की के पास जाकर झाँकने लगा। जो उसने देखा, उससे उसका दिल तेज़ धड़कने लगा।वह एक पल के लिए ठिठक गया।उसी समय उसकी जेब में रखा मोबाइल बज उठा।घंटी की आवाज़ से उसका ध्यान टूटा।उसने घबराकर इधर-उधर देखा और वापस हॉल मे जाकर सोफे पर बैठ गया।कुछ ही क्षण बाद दिव्या मैम बाहर आईं। वे हल्की नाइटी में थीं।“अच्छा… तुम आ गए?”उन्होंने मुस्कुराते हुए कहा।अनिल ने बस सिर हिला दिया।“तुम मेरे कमरे की तरफ आए थे क्या?”अनिल झट से बोला—“नहीं मैम… मैं तो यहीं बैठा था।”दिव्या ने कुछ पल उसे देखा, फिर बोलीं—“ठीक है… तुम बैठो, मैं अभी आती हूँ।”वे अंदर चली गईं।अनिल की नज़र अनायास ही उनके जाते हुए कदमों पर टिक गई। कुछ देर बाद उसने बैग से वही किताब निकाली—उठा-पटक।वह फिर पढ़ने लगा।

कहानी आगे बढ़ती है…

“कहने को तो टीचर तीस-पैंतीस साल की थी…मगर उसकी खूबसूरती देखकर कोई भी उसे बीस-इक्कीस साल की समझ लेता।उसका नाम था—रानी।”अनिल पढ़ ही रहा था कि तभी सामने से दिव्या मैम आ गईं।अनिल घबराकर किताब बैग में छिपा देता है और पढ़ाई की किताब निकाल लेता है।दिव्या उसके पास बैठकर पढ़ाना शुरू करती हैं। लेकिन अनिल का ध्यान पढ़ाई से ज़्यादा उनकी मौजूदगी पर अटका हुआ था।कुछ देर बाद दिव्या बोलीं—“तुम पढ़ाई करो… मैं अभी आती हूँ।”वे उठकर चली गईं।उनके जाते ही अनिल फिर किताब निकाल लेता है

कहानी आगे बढ़ती है…

रानी मैडम हर छात्र के सपनों की रानी थी।हर शाम वह अपने एक छात्र राजा को निजी ट्यूशन दिया करती थी…”जैसे-जैसे अनिल पढ़ता गया, उसे लगा जैसे वह खुद राजा बन गया हो।उसकी कल्पना में दिव्या मैम ही रानी बन चुकी थीं।

कल्पना की दुनिया

राजा अपनी टीचर के सामने बैठा पढ़ रहा था।रानी बोर्ड पर पढ़ा रही थीं।“सब समझ आ रहा है ना?”उन्होंने पूछा।राजा मुस्कुराया—“जी मैम… सब साफ़ दिख रहा है।”रानी उसके पास आईं।“तो बताओ मैंने क्या समझाया?”राजा झेंप गया—“मैम… मैं भूल गया।”रानी हँस पड़ीं।“तुम भी ना राजा… हर बार भूल जाते हो।”राजा की नज़रें अनायास ही अपनी टीचर पर टिक गईं।“रानी की जवानी राजा के दिल में अजीब-सी हलचल पैदा कर देती थी…अचानक…“अरे अनिल… ये क्या पढ़ रहे हो?”अनिल चौंक गया।उसने जल्दी से किताब बैग में छिपा दी।“कुछ नहीं मैम… बस जनरल नॉलेज की किताब है।”दिव्या ने मुस्कुराते हुए कहा—“तुम आखिरी चैप्टर का रिवीजन कर लो। तब तक मैं चाय बना लाती हूँ।”जाते-जाते उन्होंने प्यार से अनिल के गाल खींच दिए।अनिल का दिल तेज़ धड़कने लगा।

कहानी फिर आगे…

किताब के पन्नों में कहानी चलती रही।राजा और रानी की ज़िंदगी में एक और किरदार था—अभिषेक, जो रानी का प्रेमी था।जब अभिषेक अचानक रानी के घर पहुँचा, राजा को पहली बार एहसास हुआ कि जिस टीचर को वह पसंद करता है, वह किसी और की है।राजा चुपचाप सब देखता रहा।उसके दिल में ईर्ष्या, जिज्ञासा और आकर्षण—सब एक साथ उमड़ रहे थे।

वापस वर्तमान

अनिल ने किताब बंद की और माथे का पसीना पोंछा।“यार… राजा तो बड़ा किस्मत वाला निकला क्या सच में ऐसा हो सकता है?”वह सोच में डूब गया।“दिव्या मैम भी तो अकेली हैं…”उसके मन में अजीब- अजीब ख्याल आने लगे।वह उठकर धीरे-धीरे उनके कमरे की ओर बढ़ गया।अंदर से दिव्या की आवाज़ आ रही थी—“दो साल हो गए… तुम्हें मेरी याद भी नहीं आती…”शायद वे फोन पर अपने बॉयफ्रेंड से बात कर रही थीं। तभी उन्होंने शीशे में अनिल को देख लिया।“अनिल… तुम यहाँ क्या कर रहे हो?”अनिल झेंप गया। कुछ देर दोनों के बीच बातचीत हुई। दिव्या ने बताया कि उनका बॉयफ्रेंड दो साल से कनाडा में है और वापस आने का नाम नहीं ले रहा।अनिल ने बस चुपचाप उनकी बात सुनी। दिव्या ने उसे हल्का-सा गले लगा लिया। अनिल के लिए वह पल जैसे ठहर गया। अनिल हॉल में बैठा था। उसके हाथ में वही “उठा-पटक” किताब खुली हुई थी। वह कहानी में इतना डूब चुका था कि उसे आस-पास की दुनिया का होश ही नहीं रहा।उसकी आँखें पन्नों पर थीं, मगर दिमाग में बार-बार दिव्या मैम की छवि घूम रही थी।कहानी के राजा और रानी की जगह अब उसे खुद और अपनी टीचर दिखाई देने लगे थे।अनिल धीरे-धीरे अपनी कल्पनाओं में खोता जा रहा था।तभी अचानक उसके सामने किसी की परछाईं पड़ी।“अनिल!”तेज़ आवाज़ सुनकर वह चौंक गया।दिव्या उसके सामने खड़ी थीं। उनके चेहरे पर गुस्सा साफ दिखाई दे रहा था। उन्होंने झटके से उसके हाथ से किताब छीन ली।“ये क्या पढ़ रहे हो तुम?” उन्होंने गुस्से से कहा।अनिल घबरा गया। वह कुछ बोल भी नहीं पा रहा था।दिव्या ने किताब के पन्ने पलटे और गुस्से में बोलीं—“छी… ऐसी गंदी किताब! इसीलिए तुम्हारा ध्यान पढ़ाई में नहीं लगता।”उन्होंने किताब उठाई और खिड़की से बाहर फेंक दी।कुछ पल के लिए कमरे में सन्नाटा छा गया। अनिल सिर झुकाकर खड़ा था।दिव्या कुछ देर तक उसे देखती रहीं। फिर अचानक उनके चेहरे के भाव बदल गए। गुस्से की जगह हल्की-सी मुस्कान आ गई।वह अनिल के थोड़ा करीब आईं।धीरे से बोलीं— “जब मैं खुद यहाँ हूँ… तो तुम्हें ऐसी किताब की क्या ज़रूरत है?”अनिल ने हैरानी से उनकी ओर देखा।दिव्या ने उसके कंधे पर हाथ रखा। दोनों की आँखें एक पल के लिए एक-दूसरे में ठहर गईं।कमरे का माहौल अचानक बदल चुका था।खिड़की के बाहर हवा तेज़ चल रही थी… और अंदर दो दिलों के बीच की दूरी धीरे-धीरे कम होती जा रही थी।