एक ख़त…और बन गई मशहूर ग़ज़ल Shakeel Badayuni की अनसुनी कहानी

आज मैं आपके लिए ग़ज़ल की दुनिया का एक ऐसा दिलचस्प किस्सा लेकर आया हूँ, जो आगे चलकर हिंदुस्तानी ग़ज़ल की पहचान बन गया… एक तरह से उसका सिग्नेचर ट्यून। यह किस्सा जुड़ा है महान ग़ज़ल गायिका Begum Akhtar से। मुंबई में एक भव्य संगीत महफ़िल का आयोजन हुआ था, जिसमें बेगम अख़्तर शरीक हुईं। उस रात उन्होंने एक से बढ़कर एक ग़ज़लें पेश कीं और पूरी महफ़िल लूट ली। वहाँ मौजूद ग़ज़ल प्रेमी और संगीत प्रेमी रात भर उनकी आवाज़ के जादू में डूबे रहे। अगले दिन बेगम अख़्तर को लखनऊ के लिए ट्रेन पकड़नी थी। वे समय पर वी.टी. स्टेशन (आज का Chhatrapati Shivaji Maharaj Terminus) पहुँच गईं। अपना सामान, हारमोनियम और साथियों के साथ वे अपने डिब्बे में बैठ गईं। उसी समय एक नौजवान शायर उन्हें ढूँढते हुए स्टेशन पर पहुँचा। वह बेचैन होकर हर बोगी में उन्हें तलाश रहा था, क्योंकि वह पिछली रात की महफ़िल में शामिल नहीं हो पाया था और उनसे मिलना चाहता था। तभी ट्रेन ने सीटी दी और धीरे-धीरे चलने लगी। वह शायर दौड़ता हुआ एक डिब्बे तक पहुँचा और जैसे ही रुका, उसने देखा कि सामने बेगम अख़्तर बैठी हुई हैं। उसने अदब से सलाम किया और जल्दी से एक कागज़ का टुकड़ा उन्हें थमा दिया। ट्रेन अब रफ़्तार पकड़ चुकी थी। दोनों ने एक-दूसरे को हाथ हिलाकर अलविदा कहा और वह शायर वहीं रह गया, जबकि ट्रेन आगे बढ़ती चली गई। बेगम अख़्तर ने उस कागज़ को अपने बटुए में रख लिया।। अगली सुबह, जब ट्रेन भोपाल पहुँची, तो चाय और सिगरेट के साथ उन्होंने उस कागज़ को खोला। उसमें एक ग़ज़ल लिखी हुई थी। उन्होंने जैसे ही उसे पढ़ा, उसी समय हारमोनियम उठाया और उस ग़ज़ल को धुन में ढाल दिया। कुछ दिन बाद, लखनऊ पहुँचकर उनके रेडियो कार्यक्रम (All India Radio) का समय आया। उन्होंने कहा—
“आज मैं एक नए शायर की ग़ज़ल पेश करने जा रही हूँ…” और जैसे ही उन्होंने वह ग़ज़ल गानी शुरू की, मानो एक सुरीला इंकलाब आ गया। वह ग़ज़ल इतनी खूबसूरत बनी कि वह हमेशा के लिए अमर हो गई। उस ग़ज़ल के शायर थे Shakeel Badayuni… और वह अमर ग़ज़ल थी— “ऐ मोहब्बत तेरे अंजाम पे रोना आया…”